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अफीम के धंधे से पारसियों ने बनाया बॉम्बे

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आप जिस आइसक्रीम का मजा हर मौसम में लेते हैं, उसे पहली बार एक पारसी व्यवसायी बॉम्बे लाए थे। 1830 के दशक में उन्होंने अपने यहां आइस हाउस बनाया, जहां बॉस्टन से आने वाली आइसक्रीम रखी जाती। उनकी आइसक्रीम हर डिनर पार्टी की शोभा बनती। लोग बताते हैं कि उनके यहां पहली बार आइसक्रीम खाने वालों में से कइयों को जुकाम हो गया था। उनकी यह रईसी चीन के साथ अफीम कारोबार की बदौलत थी।

हमारे यहां के पारसियों के साथ चीन का सदियों से बहुत करीबी कारोबारी नाता रहा। ऐसा नाता कि बॉम्बे का एक बड़ा हिस्सा चीन से होने वाले व्यापार की कमाई से बसा।

चीन अभी चार महाद्वीपों को कनेक्ट करने वाले जिस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर काम कर रहा है, उसके चलते लोगों की दिलचस्पी इसके सिल्क रूट को जानने में बढ़ी है। दो हज़ार साल से भी ज्यादा पहले ईरान के व्यापारियों यानी पारसियों से चीन को बहुत फ़ायदा होता था। वहां के सम्राट ने इनकी सहूलियत के लिए रास्ते में पड़ने वाले अपने शहरों में अग्नि मंदिर तक बनवाए। 18वीं सदी में भारत के पारसी व्यापारियों के चीन सागर के इलाक़े में क़ामयाबी के झंडे गाड़ने की कहानियां जगजाहिर हैं।

पारसियों से जुड़े पर्सिया यानी आज के ईरान के साथ चीन का रिश्ता 200 र्इसा पूर्व से है। लगभग 500 ईस्वी के आसपास वहां के सासानी शासकों के साथ चीन ने राजनयिक रिश्ते बनाए और सिल्क रूट पर कारोबार बढ़ाया। पारसी लोग चीन से रेशम, कागज़, कपूर और इत्र यूरोप तक ले जाते और ईरान से वहां कार्पेट, फर्नीचर, चमड़ा और मोती ले जाए जाते।

लेकिन यह सब डेढ़ हज़ार साल पहले की बात है। अब औद्योगिक क्रांति के बाद चीन के साथ पारसियों के व्यापार की बात करें। उस समय उन्हें होने वाली कमाई और बॉम्बे में लगे पैसे का बड़ा हिस्सा इनके जरिए होने वाले अंग्रेजों के अफीम कारोबार से आया।

भारत से भेजी जाने वाली अफीम के कारोबार की वजह से ही ब्रिटेन से चीन का युद्ध हुआ था। उसमें मिली करारी हार के बाद चीन को अपना द्वीप हॉन्गकॉन्ग ब्रिटेन को सौंपना पड़ा। इस घटना को लेकर चीन के लोगों में अब भी कड़वाहट है, लेकिन ज्य़ादातर लोगों को इसके पारसी कनेक्शन का पता नहीं है।

जहां तक अफीम के व्यापार की बात है तो इसमें अंग्रेजों की एक मजबूरी भी थी। वे चाय के बदले इसका चोरी-छिपे लेनदेन करते थे। ब्रिटेन के रईस कारोबारियों को चाय चाहिए थी, क्योंकि वहां उसकी बहुत मांग थी। लेकिन बदले में चीन के सम्राट को वहां का कुछ भी लेना पसंद नहीं था। अंग्रेज मोटे तौर पर बदले में चांदी देते, लेकिन यह सब देर तक चलना मुमकिन नहीं था। हाथ तंग होने लगा तो उन्होंने भारत की अफीम को जरिया बनाया।

ऐसे में विदेशियों के साथ काम करने में कोई दिक्क़त महसूस नहीं करने वाले पढ़े-लिखे और हिसाब-किताब में होशियार पारसी व्यापारी इस धंधे में हाथ नहीं लगाते तो कोई और लगाता। चीन को अफीम कलकत्ता से बड़े पैमाने पर भेजी जाती थी, लेकिन वहां अंग्रेजों का एकाधिकार था। जब मालवा में किसानों ने कपास छोड़ अफीम उगाना शुरू किया तो बॉम्बे इसका बड़ा केंद्र बन गया। बॉम्बे में तब अंग्रेजों की कुछ खास पकड़ नहीं थी।

ईरान से आकर भारत में रहने वाले पारसियों का गढ़ पहले डच लोगों के कंट्रोल वाला सूरत था। 1680 के दशक में जब वैकल्पिक बंदरगाह के तौर बॉम्बे बसा तो वहां के पारसी यहां आ गए। बॉम्बे से चीन जाने और वहां ट्रेडिंग कंपनी शुरू करने वाले पहले पारसी हीरजी जीवनजी रेडीमनी थे। उन्होंने कैंटन में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के इलाके में काम शुरू किया।

रेडीमनी के बाद चीन पहुंचे जमशेदजी जीजीभाई, वही आइसक्रीम वाले पारसी। उनकी जेजे एंड कंपनी की बिजनेस पार्टनर थी जार्डिन मैथरसन। उसके विलियम जार्डिन चीन में कैंटन के पहले हांग यानी बिचौलिये थे। एक भारी मुसीबत में दोस्त बने जार्डिन और जमशेदजी ने साथ मिलकर चीन में अफीम कारोबार से बड़ा पैसा और नाम कमाया।

18वीं सदी में कारोबार के लिए चीन जाने वाले पारसी समुदायों में बानाजी, वाडिया, कामा, विकाजी और पारेख प्रमुख थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1864 में हॉन्गकॉन्ग एंड शंघाई बैंक के संस्थापक निदेशक भी पारसी थे। उनके नाम थे पलोनजी फरामजी और रुस्तमजी धनजीशा।

जहां तक अफीम के धंधे में पारसियों को क़ामयाबी मिलने की बात है तो आम सोच यह है कि उन्हें समय और ज़रूरत के हिसाब से ढलने, अंग्रेजों से दोस्ताना रिश्ते रखने और विदेश जाने से परहेज नहीं करने से सफलता मिली। लेकिन ओपियम सिटी: द मेकिंग ऑफ अर्ली विक्टोरियन बॉम्बे के लेखक फारूकी कहते हैं, ‘बॉम्बे प्रेसिडेंसी में पारसियों का अफीम का धंधा इसलिए जमा क्योंकि यहां ईस्ट इंडिया कंपनी का दबदबा नहीं था। कलकत्ता में अंग्रेज़ों का एकाधिकार था, इसलिए भारत के शुरुआती उद्योगपति और नामी रईस द्वारकानाथ टैगोर को भी उस धंधे में नाकामी हाथ लगी।’

चीन के साथ कारोबार में अफीम के जरिए अकूत पैसा कमाने वाले पारसियों में बड़ा नाम जमशेदजी जीजीभाई का आता है। दो सदी पहले 40 साल की उम्र में भारत के सबसे बड़े रईसों में शुमार होने वाले जमशेदजी को आप उनकी बनाई इमारतों से जानते होंगे। उनकी दान की हुई जमीन पर ही बना है मुंबई का जेजे हॉस्पिटल। उनकी ही देन है जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स। जमशेदभाई ने ही पुणे में वॉटर सप्लाई सिस्टम तैयार करने का दो तिहाई खर्च उठाया था। उनकी पत्नी आवाबाई भी परोपकार के मामले में आगे रहती थीं। माहिम दरगाह को मुख्य भूमि को जोड़ने वाली सड़क उन्होंने ही बनवाई थी ताकि श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो और उन्हें सरकार को चुंगी न देना पड़े।

मशहूर उपन्यासकार अमिताव घोष ने चीन के साथ अफीम के धंधे पर उपन्यासों की सीरीज लिखी है। इस सीरीज के दूसरे उपन्यास रिवर ऑफ स्मोक के अहम किरदार बहराम मोदी और जमशेदजी की कहानी में काफी समानता दिखती है। वही बहराम जो शादी के तुरंत बाद ससुराल से मिले पैसों से कारोबार के लिए चीन जाता है और सेठ बैरी मोदी बन जाता है।

जहां तक चीन में विदेशियों के करोबार और दबदबे की बात है तो 18वीं सदी खत्म होते-होते वहां का कारोबार डचों के हाथों से निकलकर अंग्रेजों के पास आ गया। चीन के सम्राट ने विदेशियों को सिर्फ कैंटन में कारोबार की इजाजत दी थी लेकिन दो अफीम युद्धों के बाद काराबार कई बंदरगाहों तक पहुंच गया। लेकिन यह कैंटन ही था जहां पारसियों में यूरोपियन फानूस से लेकर लकड़ी के फर्नीचर का टेस्ट डिवेलप हुआ।

बॉम्बे के पारसियों के लिए अफीम का धंधा ही मोटे मुनाफे वाला नहीं था। बहुत से पारसी उससे निकलकर टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग में चले गए। उसमें उन्हें 1860 के अमेरिकी गृह युद्ध से बहुत फायदा हुआ। उनके टेक्सटाइल में जाने की वजह यह थी कि चीन में अफीम बेचने से हो रहा मुनाफा भारत लाने में उन्हें दिक्कत होने लगी थी। ऐसा ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ लेनदेन का उनका एक सिस्टम टूटने के कारण हुआ।

चीन के साथ पारसियों के कारोबारी रिश्तों की बात हॉन्गकॉन्ग बिना अधूरी होगी। 1842 में अफीम युद्ध के बाद चीन के हाथों से निकले हॉन्गकॉन्ग की बुनियाद मजबूत करने में पारसी लोगों का बड़ा हाथ रहा। हॉन्गकॉन्ग यूनिवर्सिटी और हॉन्गकॉन्ग स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना में होरमुसजी नौरोजी मोदी यानी एच एन मोदी ने योगदान किया। वहां मोदी रोड, कोतवाल रोड जैसी सड़कों और पारेख हाउस, रतनजी हॉस्पिटल जैसी जगहों पर पारसियों का समृद्ध इतिहास दिखेगा।

लेकिन एक मोटे अनुमान के मुताबिक, दुनिया में सवा लाख की आबादी तक सिमट कर रह गए पारसियों में से हॉन्गकॉन्ग में केवल 204 और चीन में सिर्फ 21 बचे हैं। भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा 61 हज़ार पारसी हैं।

आवाज़ : अखिलेश प्रताप सिंह



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