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गन लाइसेंस से लेकर बेल-पैरोल को चैलेंज नहीं: विकास दुबे पर सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे से सवालों में यूपी पुलिस

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यूपी सरकार ने विकास दुबे एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर दिया है.

उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Government) की ओर से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में दायर हलफनामा इस ओर भी चिंता जता रहा है कि राज्य में पुलिसिंग के साथ-साथ राज्य का प्रशासन भी किस कदर सुस्त पड़ा है, जिसके कारण अपराधी वारदात को आसानी से अंजाम दे देते हैं.

नई दिल्ली. कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) के एनकाउंटर (Encounter) को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Government) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में जो हलफनामा दायर किया है, उसे देखने के बाद उसमें जवाब के ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं. पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हितेश चंद्र अवस्थी द्वारा दायर हलफनामे ने अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामा इस ओर भी चिंता जता रहा है कि राज्य में पुलिसिंग के साथ-साथ राज्य का प्रशासन भी किस कदर सुस्त पड़ा है, जिसके कारण अपराधी वारदात को आसानी से अंजाम दे देते हैं.

  • 63 आपराधिक मामलों के बावजूद विकास दुबे के पास हथियार का लाइसेंस कैसे था?

    सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे के बाद सवाल उठ रहा है कि दु​बे पर 63 आपराधिक मामले चल रहे थे. इसमें हत्या, जबरन वसूली, डकैती और अपहरण जैसे अपराध शामिल थे, इसके बावजूद दुबे और उसके गुर्गों के पास वैध हथियार का लाइसेंस कैसे था. किसने इन सभी अपराधियों को बंदूक ले जाने के लिए अधिकृत किया था. इसके साथ ही जब दुबे को हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई इसके बाद भी उसका लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया गया था. इसी तरह दुबे के कई अन्य साथियों पर भी आपराधिक मामले दर्ज थे और उन्हें कोर्ट से सजा मिली हुई थी इसके बावजूद उनके पास हथियार रखने का लाइसेंस था.

  • अगर दुबे पर 5 लाख रुपये का इनाम था तो वह कैसे बाहर था?

    हलफनामे में कहा गया है कि दुबे पर 2001 से राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था. उस पर 2020 में एक एफआईआर के तहत एक व्यक्ति को मारने के इरादे से अपहरण करने के आरोप में 5 लाख रुपये का इनाम रखा गया था. लेकिन डीजीपी इस बात पर चुप हैं कि दुबे जिस पर कुल 63 मामले दर्ज थे वह जेल में कैसे नहीं था. सवाल इसलिए भी उठना लाजिमी है ​क्योंकि इनमें से 3 मामले 2020 में ही दर्ज किए गए थे. दुबे के कुछ हालिया वीडियो भी सामने आए हैं, जिसमें वह शामिल हुआ है. इसमें से एक वीडियो में वह अपने भतीजे की शादी में भी शामिल हुआ था. कोई भी आश्चर्यचकित होगा कि 30 साल से अपराध की दुनिया में रहने वाला और 5 लाख का इनामी बदमाश कैसे जेल से बाहर घूम रहा था और पुलिस कुछ नहीं कर रही थी.

  • पुलिस ने 2020 की एफआईआर में दुबे की जमानत रद्द करने की मांग क्यों नहीं की?

    दुबे के खिलाफ 2020 में जब मामला दर्ज किया गया था उस वक्त वह जमानत पर जेल से बाहर था. ऐसे में दुबे की जमानत रद्द करने की मांग यूपी पुलिस की ओर से क्यों नहीं की गई. कानपुर पुलिस की इस एफआईआर में हत्या के इरादे से अपहरण और आपराधिक धमकी के अलावा अपहरण के दंडात्मक आरोप लगाए गए थे. यहां तक ​​कि शपथपत्र में दुबे को हिस्ट्रीशीटर के रूप में उल्लेख किया गया है. इसके बावजूद पुलिस ने उसकी जमानत रद्द कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. हालांकि डीजीपी का कहना है कि दुबे निरंतर निगरानी में थे.

  • जब दुबे को आजीवन सजा मिली थी तब वह पैरोल पर कैसे बाहर था?

    दुबे को पैरोल देने पर भी संदेह पैदा हो रहा है. 60 से अधिक आपराधिक आरोपों का सामना करने के साथ एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे विकास दुबे को किस आधार पर जेल अधिकारियों ने पैरोल पर रिहा किया था. सुप्रीम कोर्ट में DGP के हलफनामे में कहा गया है कि जब दो जुलाई को दुबे ने आठ पुलिसकर्मियों का नरसंहार किया था, तब वह एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था. हालां​कि इसके आगे कुछ भी नहीं बताया गया है कि कैसे गंभीर अपराधों की एक लंबी सूची के साथ दुबे जैसा कोई व्यक्ति पैरोल पर बाहर आ सकता है.

  • क्या राज्य सरकार और पुलिस दुबे को पकड़ने का प्रयास कर रही थी?

    हलफनामे में विकास दुबे के उन 63 आपराधिक मामलों की भी जानकारी दी गई है, जिसे उसने 2 जुलाई को 8 पुलिसकर्मियों की हत्या से पहले अंजाम दिया था. लेकिन डीजीपी ने इन मामलों की जांच, परीक्षण और सजा के बारे में कोई भी ब्योरा देने से परहेज किया है. सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे से कहीं ऐसा प्रतीत नहीं होता कि राज्य सरकार अपराधी दुबे पर शिकंजा कसने के लिए प्रयास कर रही थी.

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