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बिहार के अस्पतालों को कोरोना संक्रमण ने आईसीयू में पहुँचाया

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बिहार की राजधानी पटना में पिछले दिनों एक पत्रकार अमित जायसवाल की तबियत बिगड़ गई. कोरोना वायरस के लक्षण थे. एक जुलाई को उन्होंने जाँच कराई.

जाँच केंद्र पर कहा गया रिपोर्ट की सूचना फ़ोन पर दे दी जाएगी. अमित होम आइसोलेशन में रहने लगे. इस दौरान फ़ोन पर ही जाँच केंद्र के कर्मियों से टेस्ट रिपोर्ट के बारे में पता करते रहे.

बकौल अमित, “मुझे कहा गया कि रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तभी फ़ोन पर सूचना दी जाती है या रिपोर्ट की हार्ड कॉपी भी आती है. फ़ोन नहीं आया मतलब समझिए कि रिपोर्ट निगेटिव है.”

इस दौरान अमित ने होम आइसोलेशन में रहते हुए फ़ोन पर डॉक्टरों की सलाह से दवाइयां ली. ख़ुद का इलाज़ किया और ठीक भी हो गए. छह जुलाई से काम शुरू कर दिया. ऑफिस भी जाने लगे. 10 जुलाई को पटना पुलिस की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी गए.

अमित बताते हैं, “11 जुलाई को मुझे फ़ोन कर बताया गया कि आपकी रिपोर्ट पॉजिटिव है. मैं भागा-भागा केंद्र पहुँचा, लेकिन वहाँ यह कह दिया गया कि ICMR की गाइडलाइन के अनुसार आपने 10 दिनों का समय पूरा कर लिया है, इसलिए अब आप निगेटिव हो गए हैं. दोबारा जाँच नहीं होगी.”

अमित के मुताबिक़ अपनी रिपोर्ट की पॉजिटिव होने की जानकारी पाकर एहतियातन उन्होंने अपने घरवालों का टेस्ट भी कराया है, लेकिन पाँच दिन बीत जाने के बाद भी अब तक रिपोर्ट नहीं आई.

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यह मसला केवल अमित का नहीं है. जाँच कराने के लिए हज़ारों लोग अस्पताल दर अस्पताल भटक रहे हैं. रजिस्ट्रेशन के चार से पाँच दिनों के बाद सैंपल देने की बारी आ रही है. रिपोर्ट आने में आठ से 10 दिन लग जा रहे हैं.

अभी जिस तरह की जाँच हो रही है और जो संख्या बताई जा रही है, उस पर संदेह भी पैदा होता है.

संदेह इसलिए क्योंकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बेगूसराय और रोहतास में ऐसे पॉजिटिव मामले आए हैं कि जिस मरीज़ का नाम जाँच रिपोर्ट में है उसने जाँच कराई ही नहीं है. दोनों जगह दो-दो ऐसे मामले हैं.

क्या है सूरते-हाल?

बिहार में कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं. अंदाज़ा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है.

राज्य में पहला पॉजिटिव मामला 22 मार्च को आया था. तीन मई को 500 पॉजिटिव मामले हुए.

31 मई तक संख्या 3,807 थी और जून ख़त्म होते-होते 9744 पर पहुँच गई.

लेकिन, इसके बाद जिस तेज़ी से यहाँ संक्रमण का प्रसार हुआ है, उससे बिहार देशभर की चिंता बन गया है.

जुलाई के पहले 18 दिनों के अंदर सूबे में 15223 नए मामले मिले हैं. संक्रमण के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 24967 हो गई है. मौतों का आँकड़ा 177 है.

राज्य के रिकवरी रेट में भी अप्रत्याशित गिरावट आई है. जो 30 जून को 77 फ़ीसदी था, 18 जुलाई को घटकर 63.17 फ़ीसदी पर आ गया है.

न जाने कब बढ़ेगी जाँच?

सबसे चिंताजनक है बिहार में अब तक सिर्फ़ 3,68,232 जाँच ही हो पाना, जो आबादी के लिहाज़ से केवल तीन फ़ीसदी है.

कहने के लिए बिहार सरकार ने पटना शहरी क्षेत्र के 25 स्वास्थ्य केंद्रों पर रैपिड एंटीजन टेस्ट शुरू कर दिया है, लेकिन हर केंद्र पर जाँच के लिए लंबी लाइनें लगी हैं.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का कहना है, “441 कोविड सेंटर कार्यरत हैं, चार मेडिकल कॉलेजों को डेडिकेटिड अस्पताल बनाया गया है. कोरोना सैंपल अब अनुमंडल अस्पतालों में भी लिए जा रहे हैं. राज्य के अस्पतालों में 40 हज़ार एंटीजन रैपिड टेस्ट किट उपलब्ध हैं. युद्ध स्तर पर कोरोना जाँच के निर्देश दिए गए हैं.”

लेकिन, जिस दिन मंगल पांडे ने यह कहा उस दिन पूरे राज्य में केवल 10,502 जाँचें ही हुई.

जहाँ तक रोज़ाना होने वाली जाँचों का सवाल है, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 13 मई को कहा था कि जाँच की दर बढ़ाकर रोज़ाना कम से कम 10 हज़ार की जाए. लेकिन यह लक्ष्य हासिल करने में एक महीने से भी अधिक का वक़्त (15 जुलाई) लगा.

अब जैसे-जैसे जाँच का दायरा बढ़ रहा है, संक्रमितों की संख्या भी वैसे ही या उससे भी तेज़ी से बढ़ रही है.

मुख्यमंत्री अब कुछ हफ़्तों से यह कह रहे हैं कि जाँच की दर बढ़ाकर रोज़ाना 20 हज़ार की जाए. अगर पहले की तरह ही चला तो इस लक्ष्य तक पहुँचने में एक महीने और लगेंगे.

अस्पताल में भर्ती होना जंग जीतने जैसा है?

कोरोना पॉजिटिव मामलों के इलाज को लेकर बिहार सरकार ने एक नया नियम बनाया है, जिसके तहत वैसे मरीज़ जिनमें संक्रमण की पुष्टि तो हो चुकी है, लेकिन लक्षण नहीं हैं वे अपने घर पर ही आइसोलेशन में रहें.

सवाल है कि वे कैसे अपने घर में आइसोलेट रह सकेंगे, जो एक कमरे के घर में पूरे परिवार के साथ रहे रहे हैं? ऐसे लोगों की संख्या हज़ारों में हो सकती है.

“किसी की तबियत बिगड़ने पर और कोरोना के लक्षण होने के बावजूद भी कोई बिहार में तत्काल जाँच करा ले और अस्पताल में भर्ती हो जाए यह केवल उन्हीं लोगों के लिए संभव है जिनके पास पहुँच है, पावर है और पैसा है. हमारे जैसों के लिए अस्पताल में भर्ती ‌होना एक‌ जंग जीतने जैसा है.”

ऐसा क्यों? ये पूछने पर बिहार के सबसे पहले कोरोना अस्पताल एनएमसीएच में एक मरीज़ की पत्नी ने ये कहा.

वे बताती हैं, “पति राजा बाज़ार में सब्ज़ी बेचने का काम करते थे. इधर तीन-चार दिनों से बुख़ार हुआ है. शरीर में कमज़ोरी है. जब साँस लेने में परेशानी हो गई, तो पास के क्लिनिक में दिखाने गए. लेकिन कोरोना वायरस के कारण वहाँ देखने से मना कर दिया गया. पीएमसीएच भेज दिए. वहाँ गए तो कहा गया कि एनएमसीएच जाइए. यहाँ आने पर लोग कह रहे हैं कि शाम में नंबर आएगा हमारा, तब जाँच होगी.”

मरीज़ की पत्नी जब यह ‌सब बता रही थीं, उस वक़्त वो छटपटा रहे थे, खाँस रहे थे, ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रहे थे. हाल पूछने पर सिर्फ़ इतना ही कह सके, “बहुत तकलीफ़ है.” और फ़िर से खाँसने लगे.

वहाँ मौजूद डॉक्टरों से मरीज़ को भर्ती नहीं करने का कारण पूछा, तो उन्होंने बिहार स्वास्थ्य विभाग की तरफ़ से जारी एक कॉरिजेंडम का हवाला देते हुए कहा, “पटना वाले मरीज़ों के लिए पीएमसीएच में व्यवस्था है. लेकिन, वहाँ प्रबंधन ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं इसलिए हमें मजबूरी में सब लोगों को भर्ती करना पड़ रहा है. उसमें देरी लग रही है.”

बहुत आग्रह पर डॉक्टरों ने उस मरीज़ को तो भर्ती कर लिया, लेकिन तब तक परिसर के अंदर चार से पाँच मरीज़ और आ‌ चुके थे. ये वे लोग थे जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव थी, ज़िला अस्पतालों से रेफ़र थे, लेकिन फिर भी अस्पताल में भर्ती नहीं हो पा रहे थे क्योंकि कथित रूप से कागज़ी प्रक्रिया होनी बाक़ी थी.

क्या संक्रमण को रोका नहीं जा रहा?

अस्पताल परिसर का हाल भयावह था. मरीज़ों के परिजन इस काउंटर से उस काउंटर का चक्कर लगा रहे थे. मरीज़ बाहर खुली धूप में छटपटा रहे थे. कोई कैंसर का रोगी था, किसी को ब्लड प्रेशर की शिकायत थी.

परिसर में इधर-उधर, जहाँ-तहाँ इस्तेमाल किए गए पीपीई किट, मास्क, ग्लव्स आदि फेंके हुए थे. हमारे सामने ही एक मेडिकल स्टाफ वार्ड के अंदर से पीपीई किट पहनकर निकलीं, गेट के पास खड़े होकर किट उतारा और बगल में रखे कूड़ेदान में फेंक दिया जो पहले से भरा था. उसके चारों ओर पहले से फेंके गए किट पसरे हुए थे.

केवल मेडिकल स्टाफ़ ही नहीं, कई बार वार्ड के अंदर से आम लोग भी निकलते. किसी के हाथ में ग्लव्स नहीं होता. सबके मास्क गर्दन से झूल रहे थे. गेट पर गार्ड तो थे, लेकिन कोई रोकता-टोकता नहीं.

कोरोना अस्पताल के परिसर का हाल देखकर लगा कि जिस तरह की व्यवस्था है अगर संक्रमण फैलना होगा तो केवल परिसर में प्रवेश भर कर जाने से फैल जाएगा. सबकुछ WHO और परिवार और स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइन के उलटा हो रहा था.

एनएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड के अंदर का हाल और भी डरावना था. सब तरफ गंदगी ही गंदगी थी. कहीं खाना फेंका हुआ था, कहीं पानी पसरा था.

उमस भरे कमरों के अंदर पंखे नाम के चल रहे थे. किसी भी कमरे में में झाँकने पर मरीज़ ऐसी निगाहों से देखते मानो बहुत उम्मीद लगा बैठे हों.

एक कमरे के अंदर आठ-आठ बिस्तर लगे थे. कुछ ही ख़ाली दिखते. अधिकांश पर मरीज़ थे. बिस्तर इस तरह से लगे थे कि दो बिस्तरों के बीच दो मीटर का फासला बहुत मुश्किल से प्रतीत होता.

एक कमरे के अंदर मरीज़ों से बातचीत शुरु हुई, तो पता चला कि वार्ड में डॉक्टर कभी आए ही नहीं. केवल नर्सें आती हैं वो भी बहुत अरज-मिन्नत के बाद जब किसी मरीज़ की तबियत बिगड़ने लगती है.

दरभंगा के डीएमसीएच से रेफर एक मरीज़ जो सात जुलाई को भर्ती हुए थे, वे कहते हैं, “जब से मैं भर्ती हुआ हूँ, बस पहली बार भर्ती होने के समय ही हमारा सामना डॉक्टर से हुआ. उसके बाद से डॉक्टर केवल फ़ोन पर बात करते हैं. नर्सें दवाइयां दे जाती हैं वो भी खुली हुईं जिसको खाने पर भरोसा ही नहीं. हमलोग बाहर से दवाई मंगाकर खाने पर मजबूर हैं.”

एक मरीज जो पटना के बिहटा से थे और 10 जुलाई की रात भर्ती हुए थे, कहते हैं, “पहली ही रात में मुझे डर हो गया. वार्ड के अंदर कुत्ते घूम रहे थे. रात भर में कोई पूछने नहीं आया. कॉमन बाथरूम के गेट के पास न जाने कब से बैग में पैक करके लाश रखी हुई थी जो मेरे आने के दो दिनों के बाद हटी. मुझे लगता है कि अगर कोई मरीज़ 10 फ़ीसदी बीमार होगा तो अस्पताल आकर 100 फीसदी हो जाएगा. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है. शुरू में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी. अब सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी है. खाँसी होने लगी है.”

बिना बैकबोन के चल रहा अस्पताल

बिहार के कोरोना अस्पताल एनएमसीएच की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान और भी चौंकाने वाली बातें पता चलीं.

बिहार के एकमात्र कोरोना अस्पताल के एनेस्थीसिया विभाग में कोई सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर नहीं हैं, फेफड़ों में तेज़ गति से ऑक्सीजन पहुँचाने का कोई उपाय नहीं है, लाशों को डिस्पोज करने के लिए ना ही संसाधन हैं और ना ही आदमी हैं.

इसी अस्पताल से हाल में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें आइसीयू वार्ड के अंदर से एक मरीज़ के परिजन ने बेड पर पड़ी लाशों को दिखाया था. कथित रूप से उन लाशों को देखने भी कोई नहीं आ रहा था. हालाँकि, बाद में बिहार ‌सरकार ने उसे भ्रामक क़रार दिया.

अस्पताल के अंदर की ऐसी व्यवस्था देखकर हमने वहाँ के अधीक्षक निर्मल कुमार सिन्हा से सवाल किए.

वे कहते हैं, “उस वीडियो में ऐसा कुछ नहीं था जिससे पता चलता कि वीडियो एनएमसीएच का है. रही बात लाशों को डिस्पोज करने की तो हमारे पास एक ही टीम है, वो भी बहुत मान मनौव्वल के बाद काम पर लगती है. डिस्पोज करना पाँच से छह घंटे की लंबी प्रक्रिया है. देरी होती है. हम केवल रात में ही शवों के श्मशान या क़ब्रिस्तान लेकर जाते हैं क्योंकि दिन में जाने पर वहाँ की व्यवस्था गड़बड़ा जाती है. अतिरिक्त शव वाहनों और डिस्पोजल टीम के लिए कई बार विभाग‌ से कहा लेकिन बात ही नहीं बन पाई.”

अधीक्षक से जब ये पूछा कि आपके पास और क्या-क्या नहीं है जो होना चाहिए?

तो वे कहते हैं, “एनेस्थीसिया विभाग में कम से कम 25 सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर होने चाहिए. क्योंकि आईसीयू में सबसे अधिक उन्हीं की ज़रूरत है. वो ही इस लड़ाई के बैकबोन हैं. पर हमारे पास एक भी नहीं है. हमें असिस्टेंट प्रोफेसर से काम चलाना पड़ रहा है जो काफ़ी नहीं है.”

अधीक्षक निर्मल सिन्हा और वेंटिलेटर की भी मांग करते हैं. क्योंकि अस्पताल में बेड की संख्या 447 है, लेकिन वेंटिलेंटर 58 ही हैं.

साथ ही वे कहते हैं, “इस बीमारी से इलाज के लिए सबसे कारगर उपाय है नाक के ज़रिए तेज गति से ऑक्सीजन देना जो सिर्फ़ वेंटिलेटर से संभव नहीं है. उसके लिए ज़रूरत है हाई फ़्रीक्वेंसी वाले नैज़ल कैनुला की, जो हमारे पास एक भी नहीं है.”

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एम्स में भर्ती मुश्किल, पीएमसीएच में कोई व्यवस्था नहीं

सरकार के मुताबिक़ कोविड 19 से इलाज के लिए पटना के दो और बड़े अस्पतालों में व्यवस्था की गई है. एम्स और पीएमसीएच.

एम्स में बेड की संख्या 600 के क़रीब है. 400 से अधिक मरीज़ भर्ती हैं. लेकिन पीएमसीएच के सुपरिटेंडेट के मुताबि़क फ़िलहाल वहाँ एक भी मरीज़ भर्ती नहीं हैं, क्योंकि वहाँ अभी तक अलग व्यवस्था नहीं की गई है. राजेंद्र सर्जिकल वार्ड को विशेष कोरोना वार्ड बनाने पर काम चल रहा है. आने वाले हफ्तों में वहाँ इलाज होने लगेगा.

हालाँकि, पहले पीएमसीएच में पॉजिटिव मरीज़ों को रखा जाता था, लेकिन पिछले दिनों पीएमसीएच के दर्जनों डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के संक्रमित हो जाने और संक्रमण के कारण ही एक वरिष्ठ डॉक्टर की मौत हो जाने के बाद से मरीज़ों को एनएमएसीएच या एम्स में शिफ्ट कर दिया गया है.

15 जुलाई की रात पीएमसीएच अस्पताल में सन्नाटा था, ऐसा जैसा पहले कभी नहीं दिखा.

जहाँ तक बात एम्स की है, तो उसे भी अब डेडिकेटेड कोरोना अस्पताल बना दिया गया है. लेकिन सिर्फ उन्हीं की भर्ती हो रही है, जो दूसरे किसी अस्पताल अधीक्षक की ओर से रेफ़र किए गए हों.

एनएमसीएच और पीएमसीएच की कुव्यवस्थाओं के कारण लोग ज़्यादातर एम्स में ही इलाज कराने आ रहे हैं, लेकिन एम्स प्रबंधन सभी को अपने यहाँ नहीं रख रहा है.

16 जुलाई की दोपहर एम्स के जिस वार्ड में कोरोना संक्रमित मरीज़ों को रखा गया था, उसके बाहर लोग खड़े दिखे. बातचीत में पता चला कि उनमें से कई संक्रमित हैं और अपने भर्ती होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

एक व्यक्ति बहुत ज़ोर से खाँस रहे थे, तेज साँसें ले रहे थे, उनकी पत्नी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मी से भर्ती करने के लिए अनुनय-विनय कर रही थीं.

पीपीई किट पहने हुए वो स्वास्थ्यकर्मी बहुत रूखा बोल रहा था, “हमारे हाथ में कुछ नहीं है. जब ऊपर से आदेश होगा तभी भर्ती कर पाएँगे. आपका क़ाग़ज़ चला गया है, इंतज़ार कीजिए आदेश का.”

स्वास्थ्यकर्मी सभी लोगों से यही बात कह रहे थे. उनमें से कइयों की हालत नाज़ुक थी. एक बुजुर्ग मरीज़ दो घंटे से एंबुलेंस में बैठे थे, उनकी पत्नी भी स्वास्थ्यकर्मियों से उसी तरह विनती कर रही थी, उन्हें भी वैसा ही जवाब मिला.

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इसके पहले एम्स से ही एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें बिहार सरकार के एक पूर्व सचिव की पत्नी अपने पति को भर्ती करने की अस्पताल कर्मियों से गुहार लगाती दिख रही थीं. बाद में उनकी मौत भी हो गई. बेटे ने मौत का कारण कोरोना संक्रमण को नहीं देर तक इलाज नहीं मिल पाने को और अस्पताल में भर्ती नहीं करने को बताया.

एम्स में एडमिट करने के सवाल को हमने अस्पताल के डायरेक्टर प्रभात कुमार से पूछा. वे कहते हैं, “वैसे मरीज़ों को जिनमें लक्षण नहीं है उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत ही नहीं है. अगर संभव हो तो घर में ही आइसोलेट हो जाएँ या अगर नहीं तो निकटवर्ती किसी आइसोलेशन सेंटर में चले जाएँ. उन्हें आइसोलेट करना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है. हमारे यहाँ सिर्फ़ उन्हीं मरीज़ों का इलाज हो रहा है जो कहीं से रेफ़र हैं या क्रिटिकल हैं.”

एम्स के डायरेक्टर कहते हैं, “हमारे पास लगभग 600 बिस्तर इलाज के लिए हैं. 400 से अधिक भर चुके हैं. अगर इसी तरह सारे मरीज़ हमारे पास ही आते रहें हैं तो हम कहाँ रखेंगे सबको. इसलिए ज़रूरी है कि दूसरी जगहों पर भी इलाज की व्यवस्था हो.”

अस्पतालों में आइसोलेशन बेड को लेकर स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने 15 जुलाई को बयान दिया था कि राज्य के सभी छह मेडिकल कॉलेज-अस्पतालों में 100-100 बेड कोरोना मरीज़ों के लिए सुरक्षित किए गए हैं. उनके मुताबिक़ राज्य में कुल 39,517 आइसोलेशन वार्ड तैयार किए गए हैं.

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अब पहला सवाल तो यह है कि क्या एक अस्पताल में सिर्फ़ 100 बेडों का इंतजाम काफ़ी है? क्योंकि 38 ज़िलों में से बिहार का कोई ऐसा ज़िला नहीं है, जहाँ 100 से कम संक्रमितों की संख्या हो.

दूसरा सवाल ये कि इन 39,517 आइसोलेशन बेडों को आख़िर किस काम के लिए तैयार किया गया है, जबकि अस्पतालों में मरीज़ों को भर्ती होने में इतनी मुश्किलें हो रही है और सरकार ने अब बिना लक्षण वाले संक्रमित मरीज़ों को होम आइसोलेशन में भी रहने के आदेश जारी कर दिए हैं.

इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय समेत बिहार के स्वास्थ्य विभाग के सभी आला अधिकारियों से बात करने की कोशिश की. लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया. सवाल पूछने पर फ़ोन काट दिया गया और मिलने का समय मांगने पर कोई जवाब नहीं मिला.

कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले में बिहार की मौजूदा स्थिति को देखकर यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि यहाँ का सिस्टम अगर इसी तरह अपनी जवाबदेहियों से बचता रहा तो इसे ग्लोबल हॉटस्पॉट बनने से कोई नहीं रोक सकता.

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