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भारत में बेहद चौंकाने वाले हैं कोविड.19 होने वाली मौतों और इसके रिकवरी रेट के आंकड़े

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प्रो ज्ञानेश्वर चौबे। कोरोना के पीक (चरम) बिंदु को लेकर भारत में चर्चाएं और अफवाहें जोरों पर हैं। कोरोना ग्राफ पर इस रहस्यमयी उच्चतम बिंदु से यदि हम नीचे आ भी गए, तो संक्रमण धड़ाम से खत्म नहीं हो जाएगा। बहरहाल, भारत में कोरोना के चरम का अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा। इसको अमेरिकन ग्राफ के संदर्भ में देखें तो पता चलता है कि वहां जुलाई में ही कोरोना अपने उच्चतम स्तर को छूकर निकल चुका है। जबकि अगस्त और सितंबर में उसका ग्राफ तेजी से ढलान पर है। यानी कि हमको भी संक्रमण के स्थिर बिंदु को समझने के लिए दीर्घ अवधि का आंकड़ा चाहिए होगा, क्योंकि अभी तक तो मामले रोजाना बढ़ ही रहे हैं। हालांकि यह एक लाख के आस-पास ही बना हुआ है, मगर कोरोना के नए मामलों को स्थिर मान लेना या ढलान शुरू होना मान लेना थोड़ा जल्दबाजी होगी।

संक्रमण की संख्या के बजाय मौतों की घटती दर और रिकवरी रेट बेहद चकित करने वाली है। इससे भी ज्यादा आनंद इस बात पर हो रहा है कि भारत में हर्ड इम्युनिटी से ज्यादा कोरोना रोधी शक्ति लोगों में पहले से ही विद्यमान है। यह शक्ति उनके शरीर की कोशिकाओं में मौजूद एक्स क्रोमोसोम के जीन एसीई-2 रिसेप्टर (गेटवे) से मिलती है। दरअसल, इस जीन पर चल रहे म्यूटेशन वायरस को कोशिका में प्रवेश से रोकते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीपीय लोगों में देखा गया कि गेटवे की संरचना यूरोप और अमेरिकियों से बहुत अलग है। इस शोध से तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है कि हमारी सेल्फ इम्युनिटी से कोरोना हार रहा है। मानव विकास अनुवांशिकी का विशेषज्ञ होने के नाते यह कहना चाहूंगा कि भारत में आधुनिक मानव का अस्तित्व पिछले सत्तर हजार बरस से है। इतने लंबे अवधि में विभिन्न प्रकार की महामारियों का अनुभव हमने किया है। अनुवांशिकता की बात करें, तो भारत के लोगो में देसी वंशानुगत परंपरा रही है। इसलिए भौगोलिक और आनुवंशिक अलगाव की इस लंबी अवधि ने निश्चित रूप से रोगों के खिलाफ हमारे आनुवंशिक परिदृश्य को संर्विधत कर दिया है। इसके अलावा जाति और आदिवासी आबादी के बीच अंर्तिववाह की प्रथाओं ने भारतीयों की एक अनूठी आनुवंशिक प्रोफाइल तैयार कर दी है।

अत: अब इससे यह संभावना मिल रही है कि इस वायरस के खिलाफ देश की विविध जनसंख्या में कई स्तर की इम्युनिटी पहले से ही विकसित है। सेल्फ इम्युनिटी के बाद अब जरा पीछे जाएं तो भारत में 30 जनवरी को कोविड-19 का पहला केस जब मिला, तभी आकलन था कि लड़ाई काफी बड़ी और लंबी चलेगी। विश्व के कई बड़े-बड़े महामारीविदों ने तो यहां तक बता दिया था कि भारत में इस महामारी से इतनी मौतें होंगी कि लाशें भी न गिनी जा सकेंगी। इन भविष्यवक्ताओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने महामारी की पतली चेन को तोड़ने के लिए कड़े राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाए।

आज लॉकडाउन के खत्म होने के तीन-चार महीने बाद कोरोना की चेन मोटी तो हो गई है, मगर तमाम झंझावातों के बाद भी भारत में कोरोना का जानलेवा प्रभाव यूरोप और अमेरिका से बेहद कम है। आज हम इस निम्नतम मृत्यु दर की खुली हवा में सांस ले रहे है, जिसके पीछे अपने सरकार की ही दूरदर्शी नीति भी थी। यदि हम यूके या स्वीडन की हर्ड इम्युनिटी वाली राह पर चले होते, तो बड़ी संख्या में मौतें यहां भी हो सकती थीं। सबसे जरूरी बात, किसी भी क्षेत्र में हर्ड इम्युनिटी में जनसंख्या के 70 फीसद लोगों को संक्रमित होने की जरूरत होती है। इसीलिए ये उन्हीं संक्रामक रोगों के लिए बेहतर विकल्प है, जिनसे मौत का खतरा न हो या फिर उनका इलाज हो।

(लेखक काशी हिंदू विवि के जंतु विज्ञान विभाग में जीन विज्ञानी हैं)  

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