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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा ‘प्रियंका’ हो

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कांग्रेस कार्य समिति पार्टी वर्करों  की लम्बे समय से चली आ रही उस मांग पर निर्णय करेगी जिसमें प्रियंका वाड्रा को 2022 के यू.पी. विधानसभा चुनावों में पार्टी के चेहरे के रूप में पेश किया जाना है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जितिन प्रसाद, जोकि विशेष रूप से कांग्रेस कार्य समिति में आमंत्रित थे,ने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी किसी भी गठबंधन के साथ नहीं जाएगी। जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा 2022 के चुनावों में पार्टी का चेहरा होंगी तो इस पर उन्होंने कहा कि

कांग्रेस कार्य समिति पार्टी वर्करों  की लम्बे समय से चली आ रही उस मांग पर निर्णय करेगी जिसमें प्रियंका वाड्रा को 2022 के यू.पी. विधानसभा चुनावों में पार्टी के चेहरे के रूप में पेश किया जाना है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जितिन प्रसाद, जोकि विशेष रूप से कांग्रेस कार्य समिति में आमंत्रित थे,ने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी किसी भी गठबंधन के साथ नहीं जाएगी। जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा 2022 के चुनावों में पार्टी का चेहरा होंगी तो इस पर उन्होंने कहा कि यह कार्यकत्र्ताओं की लम्बे समय से मांग चली आ रही है, मगर यह निर्णय एक रणनीति वाला है जिसे कांग्रेस कार्य समिति तथा प्रियंका जी अपने आप लेंगी। 

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने के लिए मतदाताओं के ऊपर ध्यान केन्द्रित कर रही हैं। यदि कांग्रेस यू.पी. में मुसलमानों का 19 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों का 20.8 प्रतिशत, ब्राह्मणों का 12 से 14 प्रतिशत तथा आॢथक रूप से पिछड़ी श्रेणी मतदाताओं का समर्थन हासिल करती है तो वह अपने बलबूते पर यू.पी. में सरकार बनाएगी। मुसलमानों तथा अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बिना उच्च श्रेणी कभी भी कांग्रेस को वोट नहीं करेगा तथा यू.पी. में उनकी पसंद भाजपा हो सकती है। कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार प्रियंका लखनऊ में शिफ्ट होने जा रही हैं जहां पर पार्टी की वरिष्ठ नेता शीला कौल के घर का प्रियंका के लिए नवीनीकरण किया जा रहा है। इसके नतीजे में कांग्रेस पार्टी अपनी असफलताओं पर बेहतर दिशा-निर्देश हासिल करेगी तथा एक पॉपुलर अपील के साथ पार्टी को पुनर्जीवित किया जा सकेगा। 

अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट 

राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार को पलटने में सचिन पायलट पूरी तरह असफल रहे। यदि वह राजस्थान के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तब उन्हें कांग्रेस हाईकमान पर उस समय दबाव डालना चाहिए था जब अशोक गहलोत को विधानसभा चुनावों के तुरन्त बाद हाईकमान द्वारा मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था, मगर ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस पार्टी से इस्तीफे के बाद तथा कमलनाथ सरकार के गिरने के पश्चात  सचिन पायलट ने सिंधिया की तरह कार्रवाई की। मगर अनुभवी अशोक गहलोत के खिलाफ बुरी तरह असफल हुए। 

गहलोत कैंप के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार भाजपा का एक दिग्गज नेता, जोकि राज्य भाजपा नेताओं के साथ  क्षुब्ध दिखाई दे रहा था तथा भाजपा हाईकमान द्वारा मुख्यमंत्री पद की रेस में सम्मिलित नहीं किया गया था, ने  गहलोत को सूचित किया कि सचिन पायलट अन्य विधायकों के साथ गहलोत सरकार को तोडऩे की कोशिश में लगे हैं। इस समाचार ने अशोक गहलोत को और अधिक समय दे दिया तथा जब पायलट यह सोच रहे थे कि उन्हें 30 विधायकों का समर्थन मिल चुका है तब गहलोत 20 विधायकों को वापस लाने में सफल हुए जिसके नतीजे में पायलट के पास 10 विधायकों का समर्थन रह गया तथा उन्होंने कांग्रेस हाईकमान का आशीर्वाद खो दिया। 

डॉन से ज्यादा सशक्त जाति

यू.पी. पुलिस द्वारा डॉन विकास दुबे के एनकाऊंटर के बाद राजनीतिक दल उसकी ब्राह्मण जाति का इस्तेमाल पार्टी के फायदों के लिए करना चाहते हैं। किसी समय कांग्रेस के मतदाताओं में ब्राह्मण, दलित तथा मुसलमान शामिल थे इसलिए वह अपने समर्थन के लिए दुबे के एनकाऊंटर का इस्तेमाल करने की कोशिश में है, जबकि भाजपा  राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मणों को अपने एजैंडे में ऊपर ले आई थी मगर ब्राह्मणों ने बसपा तथा मायावती का कई बार समर्थन किया है। 2017 में ब्राह्मणों ने भाजपा के लिए वोट दिए तथा विकास दुबे के एनकाऊंटर के बाद राजनीतिक पाॢटयों ने डॉन के स्थान पर उसे शेर-ए-ब्राह्मण की संज्ञा दे डाली। बसपा प्रमुख मायावती ने विकास दुबे मामले में यह घोषणा की कि सरकार को पूरे समुदाय में आतंक फैलाने की जरूरत नहीं है। 

चुनाव के मौके पर ममता का मन बदला

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में विधानसभा चुनावों को देखते हुए अपना मन बदल डाला है। किसी समय वह जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कड़ी आलोचक थीं तथा उन्होंने उनको आर.एस.एस. की कठपुतली बताया था। ममता ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट को श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम देने तथा इस पर मोहर लगाने के लिए अपनी अनुमति दे दी है।  ममता चुनावों में क्षेत्रीय भावनाओं को किसी प्रकार का ठेस पहुंचाना नहीं चाहतीं। इसी तरह माक्र्सवादियों ने सुभाष चंद्र बोस के बारे में अपना मन बदला था तथा कोलकाता इंटरनैशनल एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा था, जब वह पश्चिम बंगाल में सत्ता में थे।-राहिल नोरा चोपड़ा

 

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