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कोरोना का टेस्ट कराने से दिमाग को होता है भारी नुकसान? जानिए सच्चाई

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सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस टेस्टिंग (Coronavirus test) से जुड़ी एक तस्वीर वायरल हो रही है। जिसमें दावा किया जा रहा है कि कोरोना टेस्टिंग ( Swabs) के लिए जो स्वॉब स्टिक नाक के अंदर डाली जा रही है, वह ‘ब्लड ब्रेन बैरियर’ (brain damage ) पर जाकर सैंपल ले रही है।

नई दिल्ली। दुनिया भर में रोजाना कोरोना (Corona) के लाखों मामले सामने आ रहे हैं। ताजे आकंड़े के मुताबिक 1.5 करोड़ से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। वहीं 5.6 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। सभी देश अधिक से अधिक मात्रा में कोरोना टेस्ट (Coronavirus test) कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस टेस्टिंग से जुड़ी एक तस्वीर वायरल हो रही है। जिसमें दावा किया जा रहा है कि कोरोना टेस्टिंग के लिए जो स्वॉब स्टिक नाक के अंदर डाली जा रही है, वह ‘ब्लड ब्रेन बैरियर’ (brain damage ) पर जाकर सैंपल ले रही है। लेकिन ये दावा पूरी तरह से फेक है। जानकारों के मुताबिक ये नाक में एक स्वॉब स्टिक डालकर ‘ब्लड ब्रेन बैरियर’ तक नहीं पहुंचा जा सकता हैं।

क्या है ‘ब्लड ब्रेन बैरियर’?

दरअसल, दिमाग़ के आसपास बह रही खू़न की धमनियों में ब्लड ब्रेन बैरियर (nasopharynx ) मौजूद होता है. यह कई परतों वाली कोशिकाओं से बना होता है। इसका काम खू़न में मौजूद अणुओं को दिमाग़ में पहुंचने से रोकना और ऑक्सीजन समेत अन्य पोषक तत्वों को जाने देना है। वहीं दिमाग़ के आसपास इसकी सुरक्षा के लिए कई स्तर की व्यवस्था होती है. सबसे पहले दिमाग़ खोपड़ी में सुरक्षित रहता है। इसके बाद दिमाग़ तरल पदार्थ और झिल्लियों में कैद रहता है।

ऐसे में ये संभव ही नहीं है कि नाक में स्वॉब स्टिक (swab test) डालकर ब्लड ब्रेन बैरियर तक पहुंचा जा सके। स्टिक को बैरियर तक पहुंचने के लिए ब्रेन की कई परतों के उत्तकों में छेद करते हुए एक हड्डी में छेद करके, खून की नसों में पहुंचना होगा। जो असंभव है।

न्यूरोसाइंस की जानकार डॉक्टर लिज़ कॉल्टहार्ड (Dr Liz Coulthard) का कहना है कि जब तक नाक में स्वॉब (Swabs don’t damage the brain) डालते हुए उतना दबाव न लगाया जाए कि उत्तकों और हड्डी की कई परतें टूट जाएं, तब तक स्वॉब ब्लड ब्रेन बैरियर तक नहीं पहुंच सकता है। कॉल्टहार्ड के मुताबिक कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए नाक की पिछली दीवार के नमूने लेता है. ये कई स्वॉब सैंपल तकनीकों में से एक है।

लिज़ के अलावा लिवरपूल स्कूल ऑफ़ ट्रॉपिकल मेडिसिन में काम करने वाले टॉम विंगफ़ील्ड बताते हैं कि “मैंने अस्पताल में काम करते हुए कई मरीजों का स्वॉब सैंपल लिया है और हर हफ़्ते एक ट्रायल के लिए अपना स्वॉब सैंपल भी लेता हूँ। नाक में किसी भी चीज़ का इतना अंदर जाना थोड़ा अजीब है। उनके मुताबिक स्वॉब सैंपल लिए जाते समय थोड़ी खुजली या गुदगुदाहट हो सकती है लेकिन दर्द नहीं होता है।













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