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संविधान पीठ के पास पहुंचा आर्थिक कमजोर वर्ग के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण का मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करने संबंधी संविधान के 103वें संशोधन कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाएं बुधवार को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दीं। 

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने कहा कि इन याचिकाओं में उठाए गए सवालों को ध्यान में रखते हुए इनपर विचार के लिए पांच सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का निश्चय किया गया है।

पीठ ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 145 (3) और उच्चतम न्यायालय के नियम, 2013 के आदेश 38 नियम 1(1) की भाषा से स्पष्ट है कि जिन मामलों में संविधान के प्रावधानों की व्याख्या के कानून शामिल हों तो उन पर पांच न्यायाधीशों की पीठ विचार करेगी।’

पीठ ने संविधान के 103वें संशोधन कानून, 2019 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 31 जुलाई 2019 को सुनवाई पूरी की थी। संविधान पीठ इस सवाल पर भी विचार करेगी कि क्या 1992 के फैसले में निर्धारित अरक्षण में 50 प्रतिशत की सीमा को लांघा जा सकता है या नहीं ।

पीठ ने कहा कि यह संशोधित कानून संविधान के समता के प्रावधानों के संदर्भ में संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है या नहीं ऐसा मामला है जिसमें कानून का सवाल अंतर्निहित है।

सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करने संबंधी संविधान के 103वें संशोधन कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाएं बुधवार को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दीं। 

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने कहा कि इन याचिकाओं में उठाए गए सवालों को ध्यान में रखते हुए इनपर विचार के लिए पांच सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का निश्चय किया गया है।

पीठ ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 145 (3) और उच्चतम न्यायालय के नियम, 2013 के आदेश 38 नियम 1(1) की भाषा से स्पष्ट है कि जिन मामलों में संविधान के प्रावधानों की व्याख्या के कानून शामिल हों तो उन पर पांच न्यायाधीशों की पीठ विचार करेगी।’

पीठ ने संविधान के 103वें संशोधन कानून, 2019 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 31 जुलाई 2019 को सुनवाई पूरी की थी। संविधान पीठ इस सवाल पर भी विचार करेगी कि क्या 1992 के फैसले में निर्धारित अरक्षण में 50 प्रतिशत की सीमा को लांघा जा सकता है या नहीं ।

पीठ ने कहा कि यह संशोधित कानून संविधान के समता के प्रावधानों के संदर्भ में संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है या नहीं ऐसा मामला है जिसमें कानून का सवाल अंतर्निहित है।

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